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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - बहुत कठिन है डगर पनघट की

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  - बहुत कठिन है डगर पनघट की

- सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ को अभी हाल ही में देश के सबसे स्वच्छ राज्य का खिताब मिला है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमत्री भूपेश बघेल गांव, गरीब और किसान को अपनी पहली प्राथमिकता में रखते है। उन्हें छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से भी ज्यादा बड़ी चुनौती कुपोषण की दिखाई देती है। यही वजह है कि पूरे राज्य में कुपोषण से मुक्ति का एक सघन कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। ऐसे सारे प्रयासो के बावजूद नीति आयोग का राष्ट्रीय बहु आयामी गरीबी सूचकांक में जिन 12 पैरामीटर पर देश भर के राज्यों का आंकलन किया गया है, उनमें छत्तीसगढ़ कुपोषण ने शीर्ष से पांचवे स्थान पर, बाल एवं किशोर मृत्युदर में चौथे स्थान पर, स्वच्छता जिसमें टायलेट का अभाव मुख्य बिन्दु है उसमें चौथे स्थान पर तथा खाना बनाने के लिए गैस का न होने में चौथे स्थान पर है। छत्तीसगढ़ गरीबी के आकंलन में देश में शीर्ष के 7वें राज्य में शामिल है, जहां 29.91 प्रतिशत गरीबी ऑकी गई है। छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश से अलग होकर बना है, वहां की गरीबी छत्तीसगढ़ से ज्यादा 36.65 है और साथ में बने राज्य झारखंड की तुलना में जहां की गरीबी का प्रतिशत 42.16 है, से काफी कम है।

यह हमारे लिए खुशफहमी का सबब हो सकता है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी छत्तीसगढ़ को अमीर धरती के गरीब लोगों की भूमि कहते रहे हैं। उनका मानना है था कि छत्तीसगढ़ में प्रचुर मात्रा में वन, खनिज जल संपदा है। यहां के लोग मेहनतकश हैं, इसके बावजूद यहां गरीबी है। नवंबर 2000 को देश के नक्शे में आये छत्तीसगढ़ ने पिछले 21 सालों में विकास के बहुत से नये आयाम स्थापित किये है। यहां की अब तक की सरकारों की उपलब्धियों और केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन में मिली सफलता, पुरस्कार को यदि हम पैरामीटर माने तो यहां बहुत कुछ हुआ है। यदि हम महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित योजनाओं की ही बात करें तो छत्तीसगढ़ को वर्ष 2016 से जून 2018 तक भारत सरकार के लक्ष्य आधारित पुरस्कारों की श्रेणी में 8 करोड़ रुपये के पुरस्कार कुपोषण दूर करने को लेकर मिले। विश्व बैंक ने भी छत्तीसगढ़ के काम की सराहना की। आंगनबाड़ी में संस्कार अभियान संचालित किया गया, जिसे अवार्ड मिला किन्तु बाद में सरकार के बदलने के साथ अधिकारियों ने इस पूरे अभियान को दर किनार करके नया अभियान शुरू कर दिया। दरअसल सरकार किसी की भी हो सबको यह समझना होगा कि जनकल्याणकारी योजनाएं भाजपाई, कांग्रेसी नहीं होती, उसे देखने, समझने के लिए एक साफ-सुथरी दृष्टि व नजरिया चाहिए।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योजना आयोग की कार्यप्रणाली से खफा थे। उन्होंने सत्ता में आते ही इसे समाप्त कर नीति आयोग बना दिया। अपने विश्वस्त और प्रशंसक अमिताभ कांत को इसका प्रमुख बना दिया, जो भारत के प्रजातंत्र को नागरिकों को मिले अधिकारों को टू मच डेयोक्रेसी करार देते हैं। नीति आयोग दरअसल वही कहता है जो प्रधानमंत्री सुनना चाहते हैं। हमारे देश की बहुत सारी संवैधानिक संस्थाओं की स्थिति लगभग नीति आयोग जैसी ही है। नीति आयोग का यह गरीबी सूचकांक सर्वे किस तरह, कैसे किया गया इसको लेकर बहुत सारे सवाल उठते हैं।

नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट पर गौर करें तो यह बात सामने आती है कि वर्ष 2004 और वर्ष 2014 में, सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर औसतन 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी। यह विडंबना ही है कि आर्थिक विकास की 8 प्रतिशत की दर एक 10 साल की रफ़्तार जो उसके बाद कायम नहीं रहा।

इसके विपरीत, देश में तब से न केवल निर्धनता की व्यापकता में वृद्धि हुई है, बल्कि निर्धनता में पूर्ण वृद्धि भी पूरी तरह से अभूतपूर्व रही है। 2021 पर आते हैं, गांवों में रहने वाले ज्यादातर असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले और गरीब हैं। पिछले एक साल से वे अनियमित काम पा रहे हैं। कठिन हालात में गुजर बसर करने के उनके किस्से अब सामने भी आ रहे हैं। लोगों ने खाने में कटौती करनी शुरु कर दी है। राशन के दाम बढऩे से लोगों ने दाल खाना बंद कर दिया। लोगों को रोजगार देने वाली मनरेगा जैसी योजना उनके काम की मांग को पूरा नहीं कर पा रही।

तमाम लोग अपनी छोटी सी जमा पूंजी पर गुजारा कर रहे हैं। कोई यह दलील दे सकता है कि अर्थव्यवस्था का बुरा दौर बीत चुका है और हाशिये के लोगों के लिए सरकार ने कई उपाय किए हैं। सवाल यह है कि इसका नतीजा क्या रहा? देश में 2011 के बाद गरीबों की गणना नहीं हुई है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के हिसाब से 2019 में देश में करीब 36 करोड़, 40 लाख गरीब थे, जो कुल आबादी का 28 फीसद है। कोरोना के कारण बढ़े गरीबों की तादाद इन गरीबों में जुड़ेगी। दूसरी ओर, शहरी क्ष़ेत्रों में रहने वाले लाखों लोग भी गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं। प्यू रिसर्च सेंटर के अनुमान के मुताबिक, मध्यम वर्ग सिकुड़कर एक तिहाई रह गया है। कुल मिलाकर चाहे पूरी आबादी की बात करें या देश को भौगोलिक खंडों में बांटकर देखें, देश में करोड़ों लोग या तो गरीब हो चुके हैं या गरीब होने की कगार पर है।

नीति आयोग ने 3 जून को सतत विकास लक्ष्य सूचकांक की वार्षिक रिपोर्ट 2020-21 जारी कर दी। इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ में भुखमरी और गरीबी दर में बढ़ोत्तरी हुई है। कम गरीबी वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ को 2018 में 50 अंक मिले थे, जबकि 2020 में 49 अंक मिले है। कम भुखमरी वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ को यहां 2018 में 46 अंक मिले थे, 2020 में 37 हो गए हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि कांग्रेस सरकार के ढाई साल के कार्यकाल मेंं गरीबी बढ़ी है। राज्य सरकार नागरिकों को खाद्य सुरक्षा दिलवाने में असफल साबित हो रही है। नीति आयोग के सतत विकास सूचकांक में ओवर ऑल 2018 में छत्तीसगढ़ को 15वीं स्थान मिला था, आज भी वही स्थान है। 2018 में तो प्रदेश को 100 प्राप्त हुई थे और संयुक्त रूप से देश में पहले स्थान पर था। कांग्रेस की सरकार बनते ही जहां प्रदेश को वर्ष 2019 में 97 अंक मिले तो वर्ष 2020 में प्रदेश यह घटकर 65 अंक हो गए। प्रदेश पहले स्थान से फिसलकर देश में 12वें स्थान पर आ गया।

स्वच्छता में देश में प्रथम स्थान पाने वाला छत्तीसगढ़ जिसकी सर्वाधिक नगरीय निकाय पुरस्कृत हुई, राजधानी रायपुर को स्वच्छता में 6वां स्थान मिला, वह राज्य नीति आयोग के आकंलन में काफी पिछड़ा हुआ है। इसके पीछे के कारणों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि रायपुर में स्मार्ट सिटी में ई-टायलेट के निर्माण का काम दो बार अलग-अलग ठेका कंपनियों को दिया गया। इसमें पहली कपंनी बेंगलुरू की थी, जिसने 40 जगहों पर ई-टायलेट बनाने का काम लिया था। एक साल से ज्यादा वक्त तक ये कंपनी रायपुर शहर में रही, लेकिन सिर्फ 5 ही टायलेट बना सकी।

पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के दावो से उल्ट भूपेश सरकार का दावा है कि प्रदेशव्यापी मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान के शुरू होने के दो सालों में ही कुपोषित बच्चों की संख्या में 32 प्रतिशत की कमी आई है। इस अभियान के साथ विभिन्न योजनाओं के एकीकृत प्लान और समन्वित प्रयास से बच्चों में कुपोषण दूर करने में बड़ी सफलता मिली है। सरकार का कहना है कि प्रदेश में जनवरी 2019 की स्थिति में चिन्हांकित कुपोषित बच्चों की संख्या 4 लाख 33 हजार 541 थी। इनमें से मई 2021 की स्थिति में लगभग एक तिहाई 32 प्रतिशथ यानि एक लाख 40 हजार 556 बच्चे कुपोषण से मुक्त हो गए हैं। कुपोषण मुक्त छत्तीसगढ़ की संकल्पना के साथ महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर 2019 से पूरे देश में मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान की शुरुआत की। सरकार की सारी योजनाओं, कोशिशों के बावजूद यदि कहीं कोई कमी रह जा रही है तो इसके लिए योजनाओं की सतत मानिटरिंग जरुरी है।

छत्तीसगढ़ में सरकारी कामकाज के तौर तरीकों के लिए यह कहावत मशहूर है-
सौ झूठ हजार लबारी
ऐसे चले काम सरकारी।