breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - आयोगों की नियति

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - आयोगों की नियति

- सुभाष मिश्र

हमारे देश में समय-समय पर बहुत से आयोग बने। हर क्षेत्र में बेहतरी, व्यवस्था सुधार या फिर किसी बड़ी घटना को लेकर आयोगों का गठन किया गया। कुछ आयोग स्थायी भाव के हैं और कुछ आयोग एक निश्चित समय-सीमा के लिए बनाये जाते हैं। आयोग का काम सभी तथ्यों से अवगत होकर एक रिपोर्ट जिसे प्रतिवेदन भी कहा जाता है, वह सौंपनी होती है। सामान्यत: कोई भी आयोग जिस अवधि के लिए वे बनाये गये हैं, उसमें रिपोर्ट नहीं सौंपे। आयोग बनाने वाले और आयोग में शामिल सभी लोग इस तथ्य से अवगत रहते हैं। कई बार पब्लिक डिमांड या पब्लिक के गुस्से को शांत करने के लिए भी आयोग बनाए जाते हैं। आयोग सेवानिवृत्त लोगों के पुर्नवास के काम भी आते हैं। सरकार को जिस काम को नहीं करना है या समय पर नहीं करवाना है, उसके लिए आयोग गठित है। जिस तरह पंचवर्षीय योजना, वित्त आयोग और न जाने कितने आयोग गठित हुए और कालांतर में उनकी भूमिकाएं सिमटती सी गई। वही हाल हमारे जांच आयोगों, न्यायिक आयोग का है। छत्तीसगढ़ के अधिकारियों-कर्मचारियों की समस्या के लिए समिति, आयोग बने किन्तु उनकी अनुशंसाएं कहां धूल खा रही है किसी को पता नहीं।
छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी नक्सलवादी हिंसा झीरम घाटी को लेकर भी आयोग गठित हुआ जिसकी चर्चा इन दिनों जोरो पर है। बस्तर के झीरम इलाके में 25 मई 2013 की शाम को हुई नक्सली हमले में 32 लोग अपनी जान गंवा बैठे थे। हमले में जान गंवाने वाले ज्यादातर छत्तीसगढ़ कांग्रेस के शीर्ष नेता थे। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा माओवादी हमला था। यह हमला बस्तर जिले के दरभा इलाके के झीरम घाटी में कांग्रेस के परिवर्तन यात्रा पर हुआ था। कांग्रेस ने सुपारी किलिंग करार दिया था।  

झीरम घाटी में हुए सबसे बड़े नक्सली हमले की जांच आयोग ने छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुईया उइके को 10 वॉल्यूम में 4184 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी है। झीरम घाटी घटना के पीडि़त शिव सिंह ठाकुर ने जांच आयोग की रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराई है।

इस घटना में कांग्रेस के तात्कालिक पीसीसी चीफ नंदकुमार पटेल, बस्तर टाइगर कहे जाने वाले महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित उदय मुदलियार, योगेंद्र शर्मा, अजय भिंसरा सहित दर्जनभर प्रमुख नेताओं की हत्या की गई थी। घटना के बाद तात्कालिक रमन सिंह सरकार ने न्यायिक जांच रिपोर्ट का गठन कर एनआईए जांच के लिए केंद्र को अनुशंसा की थी। उसके बाद केंद्र ने एनआईए जांच कराई। साल 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस की सरकार ने एसआईटी का गठन कर न्यायिक जांच आयोग के जांच बिन्दुओं में आठ नए बिन्दु शामिल किया था। जांच रिपोर्ट राज्य सरकार के बजाय राज्यपाल अनुसुइया उइके को रिपोर्ट सौंपने पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई है। छत्तीसगढ़ की तत्कालीन डॉ. रमन सिंह की नेतृत्व वाली बीजेपी की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के दौरान 25 मई को हुए हमले के बाद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में आयोग का गठन 28 मई 2013 को किया गया था। न्यायमूर्ति मिश्रा अब वर्तमान में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हैं। राज्यपाल को रिपोर्ट सौंपने को लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा, है कि ''न्यायिक आयोग ने राज्य सरकार (कैबिनेट) के बजाय राज्यपाल को अपनी रिपोर्ट सौंपकर निर्धारित और स्वीकृत प्रक्रिया का उल्लंघन किया है।   
मरकाम ने यह भी सवाल उठाया है कि आयोग को अपनी रिपोर्ट पेश करने में आठ साल क्यों लगे। साथ ही उन्होंने कहा कि यह शोध का विषय है कि आयोग ने रिपोर्ट राज्य सरकार की जगह राज्यपाल को क्यों सौंपी।

झीरम घाटी की जांच तीन माह में होनी थी जांच, किन्तु इसमें 8 साल लग गये हैं। इस आयोग का गठन 28 मई 2013 गठन, 30 जुलाई 2013, 20 फरवरी 2014, 25 फरवरी 2015, 31 अगस्त 2015, 23 फरवरी 2016, 17 अगस्त 2016, 6 फरवरी 2017, 21 अगस्त 2017, 12 फरवरी 2018, 24 अगस्त 2018, 28 फरवरी 2019 को बढ़ा कार्यकाल बढ़ा।

भाजपा सरकार ने न्यायिक जांच आयोग के समक्ष जांच के लिए 9 बिंदु तय किए थे। झीरम घाटी में 25 मई 2013 को किन परिस्थितियों में घटना घटित हुई? क्या घटना को घटित होने से बचाया जा सकता था? क्या सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त थी अथवा सुरक्षा व्यवस्था में किसी प्रकार की चूक हुई? क्या सुरक्षा के लिए सभी निर्धारित प्रक्रियाओं, आवश्यक व्यवस्थाओं का पालन सुरक्षा तंत्रों में द्वारा किया गया था? क्या सुरक्षा के लिए सभी निर्धारित व्यवस्थाओं एवं निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन रैली के आयोजकों द्वारा किया गया था और यदि हां तो उसे किस प्रकार से सुनिश्चित किया गया था? और यदि नहीं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या छगपु एवं अन्य सशस्त्र बलों के बीच समुचित समन्वय रहा? 

इसके अलावा छत्तीसगढ़ की नक्सली हिंसा या सुरक्षाबल से जुड़े जिन मामलों में न्यायिक जांच की गई है उनमें-
2011 में हुए ताड़मेटला कांड जिसमें पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों पर ग्रामीणों के घरों में आग लगाने का आरोप है। इसकी न्यायिक जांच के लिए हाईकोर्ट के न्यायधीश टीपी शर्मा की अध्यक्षता में गठित विशेष जांच आयोग गठित किया गया था जिसने लंबे अंतराल बाद अपनी रिपोर्ट दी। बीजापुर के सरकेगुड़ा में हुई घटना की जांच के लिए सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन किया था। इस घटना में गोलीबारी में 17 लोगों की मौत हुई थी। इन घटनाओं की जांच करने में गठित आयोगों द्वारा लिया गया समय कई बार बढ़ाई गई है। नक्सली हिंसा या फर्जी एनकाउंटर के नाम पर सर्वाधिक शिकार गांव के मासूम जन या सशस्त्र बल, पुलिस के वे जवान होते हैं, जो ज्यादातर आर्थिक कारणों से सुरक्षा बलों में भर्ती होते हैं। अच्छे खाते-पीते लोग जो सिस्टम में कैसे रहना है और इसका लाभ कैसे उठाना है, जानते हैं, उन्हें इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। कुछ पुलिस के अधिकारी अपने आऊट ऑफ टर्न प्रमोशन के चक्कर में भी कई बार मासूम लोगों को पकड़कर नक्सलवादी बताने में पीछे नहीं रहते। हर घटना के बाद होने वाली जांच की रिपोर्ट यदि समय पर नहीं आयेगी तो उसकी अनुशंसा की प्रासंगिकता समाप्त हो जायेगी।