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5 वां अल गूना फिल्म फेस्टिवल, मिस्र - अरब डॉक्यूमेंट्री की साहसिक दुनिया

5 वां अल गूना फिल्म फेस्टिवल, मिस्र - अरब डॉक्यूमेंट्री की साहसिक दुनिया



अजित राय

मिस्र के पांचवे अल गूना फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई दस डाक्यूमेंट्री देखकर हैरानी होती है कि यहां के युवा फिल्मकार अपनी जान की बाजी लगाकर कैसे इतनी उम्दा फिल्में बना रहे हैं जिन्हें दुनिया भर के फिल्मोत्सवों में सराहा जा रहा है। पर्यावरण, मानवाधिकार, धार्मिक कट्टरवाद और शरणार्थी समस्या के प्रति विश्व जनमत को संवेदनशील बनाने में इन फिल्मों का बड़ा योगदान है। उदाहरण के लिए  मिस्र के अली अल अरबी की फिल्म " कैप्टेंस आफ जअतारी" और सारा साजली की " बैक होम " , कुर्दिस्तान के होगीर हीरोरी की " सबाया " तथा लेबनान की जेइना डकाचे की " द ब्लू इनमेट्स ' का नाम लिया जा सकता है। इसके अलावे नीदरलैंड्स, रूस, यूक्रेन , नार्वे और स्विट्जरलैंड में भी इन दिनों बहुत उम्दा डाक्यूमेंट्री फिल्में बन रही है।

मिस्र के अली अल अरबी की डाक्यूमेंट्री " कैप्टेंस आफ जअतारी "  जोर्डन के जअतारी शरणार्थी शिविर में रहने वाले दो नौजवान फुटबॉल खिलाड़ियों, महमूद और फौजी के जीवन की सच्ची घटनाओं पर फोकस है जिन्हें अपनी मिहनत के कारण अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का अवसर मिलता है। महमूद और फौजी शरणार्थी शिविर में दिन- रात फुटबॉल खेलने का अभ्यास करते हैं। उन्हें लगता है कि इस खेल से ही उन्हें आजादी मिलेगी। पहले महमूद और बाद में फौजी का चयन एक अंतरराष्ट्रीय टुर्नामेंट के लिए हो जाता है और वे कत्तर की राजधानी दोहा आ जाते हैं। दोनों जिंदगी में पहली बार हवाई जहाज में यात्रा करते हैं और पांचसितारा होटल में ठहरते हैं।  जब वे मैच खेल रहे होते हैं तो उनका परिवार और पड़ोसी टेलीविजन पर उन्हें देखकर गोरवान्वित महसूस करता है।  उनकी कहानी देखकर महान फुटबॉल खिलाड़ी डिएगो माराडोना का बचपन याद आता है जब वे अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस एरिस की झोपड़पट्टियों में दाने दाने को मोहताज थे। दोहा में फाइनल मैच के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में महमूद सीरिया के विस्थापितों की ओर से कहता है कि शरणार्थी शिविरों में रह रहे नौजवानों को अवसर चाहिए, दया नहीं। इसके तीन साल बाद हम देखते हैं कि ये दोनों खिलाड़ी अपने शिविर में बच्चों को फुटबॉल की ट्रेनिंग दे रहे हैं और अपने भविष्य को लेकर आशंकित है।  सारा शाजली की डाक्यूमेंट्री " बैक होम " कोरोना महामारी के दौरान पेरिस से मिस्र लौटने और अपने घर परिवार और माता पिता के साथ रहते हुए अपनी जड़ों की खोज की सच्ची कहानी है।

लेबनान की जेइना डकाचे की फिल्म " द ब्लू इनमेट्स " जेलों में बंद कैदियों के लिए की गई थियेटर चिकित्सा का दस्तावेज है। जेइना डकाचे पहले बेरूत की औरतों की बाबदा जेल में गई और एक नाटक के जरिए उनके हालात, भय और सपनों को सामने लाया। यह फिल्म एक लंबे प्रोजेक्ट का हिस्सा है जिसमें रौमेह जेल की ब्लू बिल्डिंग में  मनोरोगी हो चुके कैदियों की समस्याओं को नाटक के माध्यम से बताया गया है।

नीदरलैंड्स के गाइडो हेंड्रिक्स की फिल्म " ए मैन एंड ए कैमरा "  सिनेमा का अप्रत्याशित रोमांच पैदा करती है। एक उत्साही युवक एक कैमरा लेकर एक सुबह अनायास एक कालोनी में लोगों की दिनचर्या को शूट करने लगता है। इस क्रम में उसे कई अप्रत्याशित अनुभव होते हैं। हर इंसान का चेहरा एक अलग कहानी कहता है।

स्विट्जरलैंड की श्वेतलाना रोडीना और लारेंट स्टूप की फिल्म " ओस्ट्रोव - लोस्ट आईलैंड " कैस्पियन सागर के इस द्वीप पर कभी तीन हजार परिवार रहते थे, अब मुश्किल से पचास बचे हैं जो पलायन की तैयारी में है। यहां मानव जीवन की कोई सुविधा नहीं है। इवान नामक एक आदिवासी बाशिदा रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को खत लिखकर मदद की अपील करता है।