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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संविदा कभी सहुलियत, कभी मजबूरी और कभी मनमानी....!

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - संविदा कभी सहुलियत, कभी मजबूरी और कभी मनमानी....!

- सुभाष मिश्र

संविदा व्यवस्था पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। दरअसल यह एक पुरानी बीमारी है जिसने अब धीरे-धीरे उग्र रूप लेना शुरू कर दिया है। हाल ही में हमने नौकरी की स्थायीकरण को लेकर शिक्षकों का एक बड़ा आंदोलन देखा। अभी दो दिन पहले ही जांजगीर जिले में स्थित अटल बिहारी वाजपेयी ताप विद्युत परियोजना मड़वा-तेंदूभाठा में संविदा कर्मचारियों द्वारा नियमितिकरण समेत पांच मांगों को लेकर उग्र प्रदर्शन किया गया। आक्रोश इतना ज्यादा था कि ये आंदोलन हिंसक हो गया, आगजनी और तोडफ़ोड़ की घटना से मड़वा प्लांट पुलिस की छावनी में तब्दील हो गया।

सरकारी महकमों में जिस तरह संविदा संस्कृति हावी है, उससे सरकारी कामकाज प्रभावित तो होता ही है। साथ ही बहुत बड़ी तादाद में लोग अपेक्षाकृत कम वेतन में अपने जीवन का स्वर्णिम समय इसमें बीता देते हैं। नियमित होने की आस में ये लोग कई सालों से अपनी जरूरतों से समझौता करते हुए काम करते रहते हैं। इस दौरान कई लोग दूसरी नौकरी के लिए ओवरएज हो जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सरकार को मुलाजिमों की जरूरत है तो इन्हें नियमित क्यों नहीं किया जाता। इसे एक तरह प्रशासनिक मनमानी भी कह सकते हैं।

संविदा व्यवस्था से भले ही सरकार पर पडऩे वाला भार कम होता हो लेकिन इसकी कई बुराईयां भी है, मसलन कर्मचारी को आगे अनुबंध न करने का भय दिखाकर अमानवीय परिस्थितियों में काम कराने पर मजबूर किया जाना। इसके अलावा संविदाकर्मियों को कम वेतन, कम छुट्टियां साथ ही महंगाई, चिकित्सा, आवास जैसे भत्तों से वंचित किया जाता है।

कर्मचारी से नियम विरुद्ध कार्य कराने के लिए संविदा अनुबंध न करने का अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है।    एक ही कार्यालय में दो प्रकार के कर्मचारियों के होने से भेदभाव होता है। ऐसी परिस्थितियों में संविदा कर्मचारी मानसिक तनाव का शिकार हो जाता है। एक ही पद के नियमित और संविदा कर्मचारी के वेतन में बहुत ज्यादा फर्क होता है, जिससे संविदा कर्मचारी हीन भावना का शिकार हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में भ्रष्टाचार जैसी बुराई भी बढ़ती है। संविदा भर्ती के चलते न केवल युवाओं को नियमित नौकरी नहीं मिल पाती बल्कि कई बार उच्च अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद फिर से संविदा नियुक्ति दे दी जाती है। इससे नियमित अधिकारियों को प्रमोशन नहीं मिल पाता। छत्तीसगढ़ में संविदा नियुक्ति की अधीकतम आयु 70 वर्ष है और बहुत सारे जिम्मेदार पदो संविदा के लोगों को पदस्थ किया गया है। जो अपने लाभ के लिए अपने आकाओं को इशारे पर काम करते हैं।

सरकारी नौकरियों के प्रति युवाओं के कम होते रुझान का बड़ा कारण सरकारी नौकरी में मोटिवेशन का अभाव है। सरकारी नौकरी में आया व्यक्ति रेल के डिब्बों की तरह होता है जो एक साथ चलते हैं। चाहे वह फस्र्ट क्लास का हो या थर्ड क्लास का। यदि शासकीय सेवक को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है तो वह कितना ही प्रतिभाशाली, कत्र्तव्यनिष्ठ क्यों न हो उसे साल में एक ही बार इन्क्रीमेंट मिलेगा। जब सबका प्रमोशन होगा, पद रिक्त होगा तभी उसे प्रमोशन मिलेगा। मोटिवेशन, प्रमोशन के अभाव में सरकार में लोग कहते हैं कि बने रहो पगला काम करेगा अगला। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अपनी कुर्सी के नवीनीकरण के लिए सामान्यत: पांच साल में एक बार जनता के सामने चुनाव के लिए जाने पड़ता है, जिनका कामकाज अच्छा रहता है, गणित ठीक बैठता है, उनका अगले पांच साल के लिए रिनिवल हो जाता है। जनप्रतिनिधियों के भत्ते, सुविधाएं और दीगर लाभ भी साल दर साल बढ़ते रहते हैं किन्तु सरकारी दफ्तरों में काम कर संविदा कर्मचारी को बेहतर सीआर के आधार पर ही रिनवल मिलता है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद मध्यप्रदेश से बंटवारे में कम स्टाफ मिलने और बहुत से पदों की रिक्तियों के कारण साल 2003 में राज्य के अलग-अलग दफ्तरों में संविदा पर कर्मचारी रखे गए लेकिन 19 साल बीत जाने के बाद भी इन्हें नियमित नहीं किया गया है। एक दो निगम मंडल को छोड़कर अधिकांश जगह साल दर साल नौकरी के लिए ओवरएज होते जा रहे संविदा कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चितता की स्थिति में पहुंच गया है। सविंदा, प्लेसमेंट, दैनिक वेतनभोगी, अंशकालिक शर्तों पर काम करने वाले लोगों ने बहुत बार लामबंद होकर अपने नियमितिकरण के लिए आंदोलन किया लेकिन नतीजा सिफर रहा।  

किसी भी सरकारी संस्थान, विभाग में कामकाज के सेटअप तैयार किया जाता है। विभाग की स्वीकृति सेटअप के अनुसार बहुत सारे पद सीधी भर्ती से और कुछ पदोन्नति से भरे जाते हैं। इधर के 20 सालों में अधिकांश विभाग की बढ़ी हुई जरूरतों वर्कलोड आदि के चलते वहां के रिक्त पदों के विरुद्ध संविदा या प्लेसमेंट पर लोग लेने का चलन बढ़ गया है। यदि हम अकेले छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां ढाई लाख कर्मचारी-अधिकारी को छोड़कर करीब एक लाख 80 हजार कर्मचारी ऐसे हैं जो सविंदा दैनिक वेतनभोगी कलेक्टर मानदेय, प्लेसमेंट अंशकालिक शर्तों पर काम कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या संविदा कर्मियों की है। संविदा कर्मचारियों को पहले दो साल में एक बार इंक्रिमेंट मिलता था, जो अब मिलना बंद हो गया है। संविदा कर्मचारियों को लिए सरकारी नौकरी में किसी तरह की प्राथमिकता, उम्र की छूट आदि नहीं है। अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग ने 2021 की परीक्षा के लिए जो विज्ञापन जारी किया उससे छत्तीसगढ़ के मूल निवासी शासकीय सेवकों को मिलने वाली छूट के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन के संयोजक कमल वर्मा ने इस संबंध में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र भी लिखा है।    

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के माध्यम से लोक सेवा भर्ती परीक्षा 2021 के 171 पदों के लिए 1 दिसंबर से 30 दिसंबर तक ऑनलाइन आवेदन फॉर्म भरे जा रहे हैं। ऑनलाइन भरे जा रहे हैं लोक सेवा भर्ती परीक्षा के आवेदन में पोर्टल की खामी या नियमों की अनदेखी से सामान्य वर्ग के शासकीय सेवक मूलनिवासी छत्तीसगढ़ के हजारों प्रतियोगी उच्चतर आयु सीमा में त्रुटिपूर्ण गणना के कारण फॉर्म भरने से वंचित हो रहे हैं। ऑनलाइन आवेदन पोर्टल की एज मैट्रिक्स में सामान्य वर्ग के शासकीय सेवकों को स्थानीय निवासी की आयु सीमा में छूट की गणना नहीं किए जाने से हजारों की संख्या में प्रतियोगी आवेदन भरने से वंचित हो रहे हैं।

छत्तीसगढ़ शासन, सामान्य प्रशासन विभाग  के 30 जनवरी 2019 के आदेश अनुसार राज्य सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए और उच्चतर आयु सीमा 35 वर्ष में 5 वर्ष की छूट है। छत्तीसगढ़ के मूल निवासी शासकीय सेवक को सामान्य वर्ग से हैं उनके आवेदन में मूलनिवासी की छूट की गणना नहीं की जा रही है। यहां सवाल यह है कि जो गरीब तबके के आवेदक हैं वे कोई भी छोटी-मोटी नौकरी मिलती है तो उसे ज्वाइन कर लेते हैं और लगातार बड़े पद की तैयारी करते हैं। ऐसे बहुत से शासकीय सेवकों के उदाहरण है जो पहले छोटे पद पर थे, फिर अपनी मेहनत से यूपीएससी और पीएससी जैसी परीक्षाओं में सलेक्ट हुए उन्हें अपनी नौकरी की सेवा अवधि का लाभ मिलता था, जो इस तरह के फैसलों से नहीं मिल पाएगा।

केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न विभागों में संविदा के आधार पर नियुक्ति देकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटती है। संविदा आधारित नियुक्ति में अपने चहेतों को लाने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और योग्य अभ्यर्थी मुंह ताकते रह जाते हैं। इसलिए संविदा व्यवस्था सरकार के कामकाज पर गहरा असर डाल रही है। इसके स्थाई हल की ओर बढऩे के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। क्योंकि हमारा समाज स्थायित्व की तलाश में रहता है।