Grove of life अजीब ही नज़ारा हैं इस बदलती दुनिया का!!

जगदीश सिंह सम्पादक

Grove of life  अजीब ही नज़ारा हैं
इस बदलती दुनिया का!!
वो भी सब कुछ बटोरते हैं,
जो खाली हाथ जाने का उपदेश देते हैं!

Grove of life  जीवन के उपवन में रमता मन कब दर्द कब खुशियों के बाग में आसन लगा दे पता ही नहीं चलता?पल पल सांसें ऊपरवाले के एहसान से गतिमान है!फिर भी मुगालते में पलते इन्सान को देखकर मुस्कराते भगवान! पल का भरोसा नहीं कल के लिए हर कोई परेशान हैं। आया है सो जायेगा यही बिधि का विधान है सबकुछ जानते हुए भी मगरुरीयत में नियत खराब कर दिन रात आकांक्षाओं की उड़ता ऊंची उडान है।

यह मालूम तो सबको है जीवन के आखरी सफर की मंजिल श्मशान है!कायनाती ब्यवस्था का यह सच जो कभी नहीं बदल सकता अमिट विधान है!जि़न्दगी के साथ ही मौत का दिन भी तय हो जाता है हर रोज उम्र का दायरा घटता है जि़न्दगी की हम जोली बनकर मौत कदम कदम पर साथ साथ रहकर दोस्ती निभाती है! जिस दिन जि़न्दगी तक जाती मौत वफादारी के साथ अपना फर्ज पूरा कर जाती है।दोस्ती का इससे मजबूत उदाहरण दुनियां में शायद नहीं मिलेगा!

साथ साथ आते साथ साथ बिदा हो गए! प्रकृति का अजीब नियम है धूप के साथ छांव दिन के बाद रात मौत के बाद जि़न्दगी दुख के साथ सुख को सहपाठी बनाकर ही मालिक ने इस दुनियां को बनाया!अवतरण दिवस के बाद से ही अवसान दिवस वीवस होकर मंजिल के तरफ बढऩे लगता है न चाहते हुए भी पुर्णिमा के चांद के बाद अंधेरा बढऩे लगता है!उम्र का पड़ाव सद्भाव सम्भाव लगाव के बीच कर्म के राह पर चलकर ही स्थापित होता है!

कायनाती इन्त जमात में ही कभी अवसाद तो कभी उन्माद में फंसकर आदमी अपनी आदमियों को भूल जाता है।इन्सानियत की हत्या करता है! सभ्य समाज में समस्या पैदा करता है? खुद अपने अनमोल जीवन के बर्बादी का सौदा करता है!जरा गौर करें जीवन का बीस वर्ष उत्कर्ष में गुजर जाता है! चालीस वर्ष संघर्ष में गुर जाता है! जो बचता है वह इन वर्षो में किए गए कर्मों के हिसाब किताब के विचार विमर्श में असहाय लाचार होकर गुजरने लगता है।जो बोया था उसकी फसल लहलहाने लगती है।

फिर अवसान का आखरी पहर श्मशान के तरफ जाने का इशारा शुरु कर देता है।महज चन्द दिन की जि़न्दगी में स्वार्थ के वशीभूत आदमी अपनी आखरी मंजिल की गति को भूलकर घृणा का पात्र बन जाता है।धन दौलत महल अटारी सुख सन्तान खुद का अभिमान कुछ भी तो साथ नहीं जाता! यही खेल कर दिया विधाता!मगर स्वार्थी स्वभाव के लगाव मे इन्सानियत के अभाव को देखकर मुस्कराता है श्मशान !कितना मूर्ख है इन्सान!

साथ कुछ नहीं जाने वाला है फिर भी दिन रात भौतिक सुख सुविधा झूठे आडम्बर में फंसकर अपनी औकात को अपने लोगों के बीच आत्मसात कर देता है भूल जाता इसके बाद भी कहीं जीवन के लेखा जोखा का होगा हिसाब! वहां न तेरी चालाकी चलेगी न चलेगा रुआब! पल पल गुजरता हर लम्हा तन्हा होने का एहसास तो कराता है मगर माया के महा जाल में उलझा मानव मन वक्त का बन्धक बना सार्थकता से अनभिज्ञ निरन्तर निर्थकता के चंगुल में फंसता जाता है।बदलता परिवेश आजकल बिशेष आस्था के प्रभाव में आकर सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण कर रहा है।अर्थ तन्त्र का जमाना है! हर कोई इसी का दीवाना है!भगवत भजन करने वाले भी सोने चांदी हीरा माणिक के मोह में बंधकर अकूत सम्पदा के मालिक बन रहें हैं।सत्संगी कथा को भी स्वार्थ की ब्यथा से पिडीत होकर धनलक्ष्मी को बन्धक बना रहे हैं?गजब साहब कलयुगी कथा वाचक से लेकर धर्म गुरु तक लक्ष्मी का पूजारी बनकर दिन रात महल अटारी के सुखभोग में लग गये!

Grove of life  उनके सामने इन्सानियत बौना है! मानवता का कर्म घिनौना है! रुपये की चादर रूपया ही बिछौना है।देश की विकृत होती ब्यवस्था में धर्म के नाम पर अधर्म करने वालों की अधोगति भी समाज देख रहा है?सर्व व्यापी घट घट व्यापी आदिशक्ति की भक्ति के नाम पर आशक्ति का खेल करने वाले जेल काट रहे हैं! साथ कुछ नहीं जायेगा का उपदेश देने वाले धन लक्ष्मी को बन्धक बनाकर मलाई चाट रहे हैं! समाज में धर्म मजहब की आड़ में तफरका का पैदा करने वाले धर्म गुरु इन्सानियत की आबरु तार तार कर रहे हैं।

आज तक कोई नहीं बता पाया कायनात के मालिक का कौन सा धर्म मजहब है! वही भगवान वहीं रब है!धन सम्पदा वैभव का उपभोग उपयोग करने वाले भी वही जाते हैं जहां भूख से तड़प तड़प कर मरने वाले जाते हैं!कायनात में सारी ब्यवस्था समदर्शी है!श्मशान कब्रिस्तान का नियम बिल्कुल पारदर्शी है! न कोई बड़ा हैन छोटा है! सबका समान हिसाब किताब यही पर बराबर होता है!चन्द लम्हों में राख बन कर मिट्टी में मिल जाने वाले मौत के दिन तक अहम को लिए सब अपने है का बहम पाले रखते हैं! लेकिन जब रामनाम सत्य का उद्घोष शुरु होता है उस समय न कोई अपना होता है न पराया!

Grove of life  महज मुस्कराता स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए स्वागत में खड़ी मिलती है मौत! पश्चाताप करती है वो जीव आत्मा जो छोड़ चुकी होती है काया! सोचती है आखिर इस नश्वर शरीर में रहकर हमने क्या पाया!माया विहीन महा महाकाल के आश्रम में चिता पर जलती सुन्दर शरीर का हश्र देखकर भयाक्रांत भवसागर में उठती बेदना शून्य लहरों में तड़पते सिसकते आत्माओं के भीड़ मे विलीन होने के पहले एक बार हसरत भरी नजर से अपनो के स्वार्थी मिजाज को देखकर पश्चाताप करती फिर कभी नही इस नश्वर संसार में वापसी की कसम खाते शून्य में सिसकते विलीन हो जाती है।प्रकृति का यह रश्मों रिवाज जब तक दुनियां है चलता रहेगा कर्म फल भोग कर जाने की परम्परा कायम रहेगी।जो बोएगा कोई वहीं काटना होगा कोई भी इस कर्म फल से नहीं बच सका है !

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