Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – चुनौतियों के बीच तीसरी पारी

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र

-सुभाष मिश्र

बतौर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी तीसरी पारी शुरु कर दी है। रविवार को मोदी के 71 मंत्रियों ने शपथ ली। इस भारी-भरकम मंत्रिमंडल में प्रदेश, जाति, समुदाय घटक दल सभी को साधने की कोशिश की गई है। युवा और अनुभवी दोनों तरह के नेताओं को मौका दिया गया है। शपथ से पहले एनसीपी कैबिनेट मंत्री की मांग को लेकर सरकार में शामिल नहीं हुई। मोदी 3.0 पर गठबंधन का असर है। लगातार तीसरी बार पीएम बनने वाले मोदी ने अपना सबसे बड़ी मंत्रिपरिषद बनाया,जिसमें कुल 71 मंत्री हैं। 2014 में 45 और 2019 में 57 मंत्रियों ने शपथ ली थी। इस बार 30 कैबिनेट मंत्री हैं। 2019 में 24 और 2014 में 23 कैबिनेट मंत्रियों ने शपथ ली थी। यानी कैबिनेट मंत्रियों की संख्या में 25 प्रतिशत का इजाफा है। 5 कैबिनेट कुर्सियां गठबंधन को दी गई हैं। कैबिनेट में इस बार 7 महिलाएं शामिल हैं। पहले टर्म में 8 और दूसरे टर्म में 6 महिलाएं थीं। सबसे युवा टीडीपी के राम मोहन नायडू और सबसे बुजुर्ग 79 साल के जीतनराम मांझी को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। कांग्रेस या अन्य पार्टियों से भाजपा में आए 13 लोगों को भी मंत्रिमंडल में जगह मिली। 4 ब्यूरोक्रेट्स भी मंत्री बने हैं। प्रधानमंत्री मोदी समेत सात पूर्व मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल में शामिल हैं इनमें शिवराज सिंह चौहान, राजनाथ सिंह, जीतन राम मांझी, एचडी कुमारस्वामी, मनोहर लाल खट्टर, सर्बानंद सोनोवाल का नाम शामिल हैं।
रवनीत सिंह बिट्टू (पंजाब) और जॉर्ज कुरियन (केरल) दोनों सदनों- लोकसभा और राज्यसभा के सांसद नहीं हैं, फिर भी मंत्री बनाए गए। रवनीत बिट्टू पंजाब के पूर्व सीएम बेअंत सिंह के पोते हैं। जॉर्ज कुरियन को ईसाई चेहरे के रूप में जगह दी गई है। इन दोनों राज्यों में भाजपा अपना वोट बैंक बढ़ाने और जड़ें मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है, हो सकता है ये उसी रणनीति का हिस्सा हो!
पिछली बार हाईप्रोफाइल मंत्रियों में शामिल स्मृति ईरानी, अर्जुन मुंडा, मीनाक्षी लेखी, आरके सिंह, संजीव बालियान, निशिथ प्रमाणिक, अश्विनी चौबे इस बार मंत्रिमंडल में नजर नहीं आ रहे हैं। मोदी 2.0 के कुल 14 मंत्री यूपी से थे, इस बार भी 9 मंत्री यहीं के हैं. इनमें से सात भाजपा से हैं और दो गठबंधन सहयोगी। रालोद के जयंत चौधरी और अपना दल(एस) की अनुप्रिया पटेल। हालांकि, कैबिनेट में प्रदेश से केवल राजनाथ सिंह को एंट्री दी गई है, बाक़ी सब राज्य मंत्री हैं। चर्चा है कि चुनावों में ओबीसी और दलित वोट्स को विपक्षी गठबंधन इंडिया के पाले में शिफ़्ट होता हुए देख, और ठाकुर नेताओं के एक वर्ग की नाराजग़ी को देखते हुए भाजपा ने जातिगत संतुलन बनाने की कोशिश की है. नौ मंत्रियों में से तीन ओबीसी हैं, दो दलित, दो ठाकुर समाज से हैं, पीलीभीत से जीतने वाले जितिन प्रसाद यूपी से एकमात्र ब्राह्मण मंत्री हैं, जब कि जयंत चौधरी के रूप में एक जाट नेता भी शामिल हैं। यूपी में मिले झटके के बाद कुछ सोशल इंजीनियरिंग करने की कोशिश की है। आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों का चुनाव किया गया है, कम सीट मिलने के बाद भी दक्षिण के राज्यों को अहमियत दी गई है। हालांकि, छत्तीसगढ़ के नजरिए से देखा जाए तो 11 में से 10 सीट देने के बाद भी सिर्फ एक राज्य मंत्री राज्य के कोटे में आया है। प्रदेश से कई बड़े दिग्गजों की दावेदारी को पीछे छोड़ते हुए बिलासपुर से पहली बार चुनाव जीतने वाले तोखन साहू को राज्यमंत्री के तौर पर काम करने का अवसर मिला है। जबकि बृजमोहन अग्रवाल, संतोष पांडेय, विजय बघेल को प्रदेश से बड़े दावेदार के रूप में देखा जा रहा था।
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से ही लोकसभा चुनावों में यहां भाजपा का दबदबा रहा है लेकिन केन्द्रीय मंत्रिमंडल में इस तरह से प्रतिनिधित्व राज्य को कभी नहीं मिला। अटल सरकार में एक वक्त प्रदेश से तीन राज्यमंत्री रमन सिंह, रमेश बैस और दिलीप सिंह जूदेव थे। उसके बाद यूपीए-वन में मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में छत्तीसगढ़ से एक भी मंत्री नहीं था, उस वक्त के चुनाव में अजीत जोगी ही अकेले कांग्रेस से चुनाव जीत कर आए थे। इसके बाद यूपीए- टू में 2009 में डॉ. मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में चरण दास महंत बतौर राज्य मंत्री शामिल हुए। 2014 में मोदी सरकार में एक मंत्री विष्णु देव साय , 2019 में मोदी टू में रेणुका सिंह को मौका मिला, जबकि 2024 में मोदी-3 में तोखन साहू को राज्य मंत्री बनाया गया। यानि राज्य बनने के बाद प्रदेश का कोई भी नेता किसी भी सरकार में कैबिनेट मंत्री नहीं बन पाया है। विपक्ष इसको लेकर भाजपा पर छत्तीसगढ़ की उपेक्षा करने का आरोप लगा रहा है। आने वाले दिनों में इसको लेकर सियासी बयानबाजी जारी रहने की संभावना है। हालांकि सरकार में मंत्रियों की संख्या 81 तक हो सकती है, यानी अभी आगे भी मंत्रिपरिषद में विस्तार की गुंजाइश है।
सरकार चलाने के मामले में पिछले दो टर्म से ज्यादा चुनौती इस बार रहेगी क्योंकि पीएम मोदी इस बार सहयोगी दलों की मदद से सरकार चलाएंगे। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि सहयोगियों के दबाव के बीच मोदी सरकार किस तरह परफॉर्म करेगी और बड़े फैसलों को लागू कराएगी। पीएम मोदी सहयोगियों के दबाव को कितनी सहजता से झेलते हैं ये देश की राजनीतिक भविष्य को तय करेगा।
प्रधानमंत्री मोदी के इस कैबिनेट में एक भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। अभी मंत्रियों के विभागों का बंटवारा नहीं हुआ है जैसे ही इनके विभागों का बंटवारा होगा तो उम्मीद की जा रही है कि एनडीए और घातक दलों में इसको लेकर उहापोह की स्थिति बने। सरकार हमेशा सरलता और सहजता से चलती है, जबकि पीएम मोदी हमेशा से एकला चलो की नीति पर कायम रहे हैं अगर वे इस बार भी ऐसा करेंगे तो सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी ऐसा राजनीति के विशेषज्ञों का मानना है। कहीं न कहीं तमाम शंकाओं-कुशंकाओं के बीच अभी मोदी की तीसरी पारी है। अभी मोदी के सामने उनकी गारंटी है। 2 करोड़ युवाओं को नौकरी देने की बात है। महंगाई को काम करने की

बात है। किसानों की आय दोगुनी करने की बात है। तमाम तरह की चुनौतियां अभी मोदी सरकार के सामने है। कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव हैं। मोदी सरकार के सामने तमाम चुनौतियां हैं, वो आने वाले समय में किस तरह से अपनी राजनीति को तय करते हैं? उनका जो नारा है सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास उसको किस प्रकार अपने राजनीतिक चरित्र में प्रतिबिंबित करते हैं, यह तो आने वाला समय बताएगा।

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