Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – बुनियादी जरूरतों से जूझता सिस्टम

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र

-सुभाष मिश्र

बिजली, पानी और सफाई स्थाई समस्या है ये हमेशा रहेगी, इसे हमेशा के लिए खत्म नहीं किया सकता। ये कहना है रायपुर के महापौर एजाज ढेबर का। उन्होंने ये भी कहा कि प्रधानमंत्री भी इन्हें खत्म नहीं कर सकते। उनके इस बयान पर सियासत भी गर्म है। बिजली, पानी, सफाई बिल्कुल बुनियादी जरूरत है, जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी शहर सरकार यानि नगरीय निकायों की है। लेकिन देश के ज्यादातर निकाय गागरिक सुविधा मुहैया कराने में सफल नजर नहीं आते। छत्तीसगढ़ में जब कांग्रेस की सरकार थी तब रायपुर मेयर राजनीतिक रूप से काफी शक्तिशाली नजर आ रहे थे। वे मुख्य़मंत्री की तर्ज पर वार्ड-वार्ड जाकर लोगों से मुलाकात करते थे और उनकी समस्या सुलझाने का दावा करते थे। लेकिन प्रदेश से सत्ता जाने के बाद मेयर साब भी मजबूर नजर आने लगे हैं। अब तो वे पानी-बिजली और सफाई को भी अनवरत समस्या की तरह देख रहे हैं।

गौरतलब है कि रायपुर को स्मार्ट बनाने क लिए करोड़ों रुपए खर्च किए गए है, लेकिन इस भारी-भरकम खर्चे के बाद भी समस्या पानी और सफाई पर आ कर रुक जाए तो इसे क्या कहा जाए। बहरहाल, रायपुर मेयर के बयान पर सियासी दांव पेच उनके विरोधी लगा रहे हैं, लेकिन इस बयान के बहाने हम अंधाधुंध शहरीकरण, आधुनिकता की बड़ी-बड़ी बातों के बीच खड़े बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल के बारे में बात करना चाहते हैं।

आजादी के बाद से हमारे देश में बड़ा मुद्दा पानी, बिजली, सड़क, आवास, रोजगार जैसे मुद्दे रहे हैं। गौरतलब है कि सार्वजनिक स्थानों में साफ-सफाई का मुद्दा काफी बाद में जुड़ा। 21वीं सदी में जहां हम दुनिया की तीसरी बड़ी इकॉनामी बनने की तैयारी कर रहे हैं, दूसरी ओर हम पेयजल को लेकर आश्वस्त नहीं है। एक तरफ हमारी दस्तक मंगल और चांद तक पहुंच रही है, दूसरी ओर शहरी इलाकों में भी बिजली और साफ-सुथरी सड़कें लोगों को उपलब्ध न हो तो फिर विचार करना जरूरी है।

ऐसे में इतने भारी भरकम बजट के बाद भी क्यों बेबस नजर आ रहे हैं शहरी सरकार ये समझना भी जरूरी है। दरअसल भारत में पिछले कुछ दशकों में ग्रामीण क्षेत्रों से तेजी के साथ शहरों की तरफ बड़ी आबादी का पलायन हुआ है, जिसके चलते देश में जगह-जगह अंधाधुंध अव्यवस्थित शहरीकरण हुआ है। हालांकि किसी क्षेत्र को शहरी क्षेत्र माने जाने के लिए कुछ आवश्यक मानदंड हैं, जिनके अनुसार उस क्षेत्र में 5000 या इससे अधिक व्यक्तियों की आबादी का निवास करना जरूरी है। वहां की 75 फीसदी आबादी गैर-कृषि व्यवसाय करती हो। वहीं इस क्षेत्र का जनसंख्या घनत्व भी 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर होना चाहिए। शहरी क्षेत्र के लिए कुछ अन्य विशेषताएं भी होती हैं, जिसमें उस क्षेत्र में उद्योग-धंधे, व्यवस्थित आवासीय क्षेत्र, सुनियोजित ढंग से बिजली-पानी, सीवरेज की व्यवस्था और सार्वजनिक परिवहन जैसी मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था होती है, ऐसे आबादी वाले क्षेत्र को ही शहर के अंतर्गत मानते हैं।

इन सुविधाओं से आकर्षित होकर व ग्रामीण क्षेत्रों की कठिन जीवनशैली के चलते देश में पिछले कुछ दशकों में लोगों ने रोजी-रोटी व सुविधाओं की तलाश में बड़े पैमाने पर गांव से शहरों की तरफ पलायन किया है। जिसके चलते आज आलम यह है कि पुराने शहरों के अव्यवस्थित विस्तार के साथ कुकुरमुत्ते की तरह जगह-जगह अंधाधुंध वैध व अवैध शहरी क्षेत्र बन गये हैं। जिन क्षेत्रों के सभी निवासियों को गुणवत्तापूर्ण मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाना हमारे सिस्टम के सामने बड़ी चुनौती बन गया है।

वैसे, शहरीकरण से संबंधित अगर कुछ आँकड़े देखें तो साफ नजर आता है कि कभी गांवों का देश माने जाने वाला भारत अब तेजी से शहरों में बदल रहा है। इन आँकड़ों के अनुसार देश में वर्ष 2001 तक हमारी आबादी का 27.81 फीसदी हिस्सा शहरों में रहता था। जबकि वर्ष 2011 के आंकड़ों के अनुसार यह स्थिति बदल कर 31.16 फीसदी तक पहुंच गई और वर्ष 2018 में तेजी के साथ बदलते हुए शहरीकरण का यह आंकड़ा बढ़कर 33.6 फीसदी तक पहुंच गया। देश में शहरी आबादी में तेजी से हुई यह बढ़ोत्तरी बेहद आश्चर्यजनक है। वहीं देश में वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार शहर-कस्बों की कुल संख्या 5,161 थी, जो कि वर्ष 2011 की जनगणना में तेजी से बढ़कर 7,936 हो गई, वहीं अब नयी जनगणना में इस स्थिति में फिर से वृद्धि देखने को नजर आयेगी।

देखें तो संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्व की करीब आधी आबादी शहरों में निवास करने लगी है। वहीं जिस तेजी के साथ भारत में गांवों से रोजी-रोटी व सुविधाओं की तलाश में पलायन अनवरत चल रहा है उसको देखकर लगता है कि वर्ष 2050 तक हमारे देश की भी आधी आबादी शहरों-कस्बों के क्षेत्र में आकर के निवास करने लगेगी। जो यह दर्शाती है कि भारत में शहरीकरण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। देश में तेजी के साथ होते इस शहरीकरण का सबसे दुखद पहलू यह है कि हम लोग नित-नई समस्याओं से जूझने के चलते औसत स्तर का जीवन जीने से भी वंचित होते जा रहे हैं। आज देश में शहरी क्षेत्रों में आलम यह होगा गया है कि शहरी आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा लगभग 17.4 फीसदी लोग तो सुविधाओं के भारी अभाव के साथ ही झुग्गी-झोपडिय़ों में जीवन यापन करने के लिए मजबूर हैं। केन्द्र सरकार ने जून 2015 में स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत की थी। इसके तहत भी बहुत से काम हुए हैं। हालांकि कई प्रोजेक्ट्स में गड़बड़ी के मामले यहां भी सामने आते रहे हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है जो मिशन हमारे देश के प्रधानमंत्री के इतने करीब हो वहां भी काला-पीला हो जाता है, तो अन्य योजनाओं की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

स्मार्ट सिटी मिशन से जुड़ी भारत सरकार की वेबसाइट पर जिन विषयों को कोर बुनियादी सुविधा के रूप पर रखा गया है उनमें पहले तीन साफ पानी, बिजली और सफाई है। अब इन्ही तीनों को अनवरत समस्या जिसका कोई स्थाई हल नहीं है, के रूप में रायपुर मेयर देख रहे हैं।

भारत में शहरी और ग्रामीण मिश्रित व्यवस्था रही है। जो पिछले कुछ दशकों से लगातार ध्वस्त हो रही है, उपर बताए कई ऐसे कारण जिसके चलते लोग तेजी से शहर की और आकर्षित हो रहे हैं। इसके चलते भी जो सदियों हमारा बना हुआ संतुलन गड़बड़ा रहा है, ऐसे में हमें गांव की ओर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जिससे शहरों पर दबाव कम हो। साथ ही ये भी सच है कि यह कल्पना करना बेमानी होगा कि गाँव के विकास के बिना देश का विकास किया जा सकता है।

थोड़ी सी सुविधाएं प्रदान कर देने मात्र से गांवों का विकास होना बहुत मुश्किल है। बदलते वक्त के साथ अगर भारतीय गाँवों पर ध्यान नहीं दिया गया तो इनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। ग्रामीण संकट का मूल कारण वहां रहने वालों की आय का कम होना है। इसके लिये सरकार को इस ओर खासतौर पर ध्यान देना होगा। अन्यथा गांवों से शहर की ओर पलायन जारी रहेगा। गौरतलब है कि 2011 से देश में जनगणना नहीं हुई है। इसके चलते भी योजनाओं को लागू करने आबादी के दबाव को समझते हुए चीजों को देखने में समस्या आ रही है। 2047 में विकसित भारत का सपना देखने से पहले हमें अपनी क्षमताओं और समस्याओं को बेहतर ढंग से समझना होगा। इसके लिए जनगणना एक बेहतर और सशक्त माध्यम हो सकता है और देश को पता चल सकता है कि बुनियादी समस्याओं की लड़ाई में हम कहां खड़े हैं।

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