Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – चिंतन : क्यों निशाने पर है मीडिया

Editor-in-Chief सुभाष मिश्र

-सुभाष मिश्र

भारतीय मीडिया आज उन सभी लोगों की ओर से सवालों के घेरे में है जिनके बीच वो काम करता है। हाल ही में हुए चुनाव के दौरान और उसके बाद मीडिया की भूमिका पर सवाल देश के बड़े नेता कर रहे हैं। एनडीए संसदीय दल की बैठक में नवनिर्वाचित सांसदों को संबोधित करते हुए नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ब्रेकिंग न्यूज के आधार पर यह देश नहीं चलेगा। भले ही वो नव निर्वाचित सांसदो को जमीनी राजनीति और खुद के सूझबूझ से काम लेने की बात कह रहे हों, लेकिन कहीं न कहीं मीडिया द्वारा प्रसारित खबरों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। इसी तरह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने जिस तरह एक चैनल की महिला पत्रकार से बर्ताव किया उसकी चौतरफा निंदा हो रही है।
राजनेता आए दिन मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहे हैं, यहां तक मीडिया भी दो भागों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। एक दूसरे पर दोनों धड़ा लगातार हमलावर हैं। सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे के कार्य की आलोचना की जा रही है। लोकतंत्र के चौथा स्तंभ माने जाने वाले मीडिया की ये दुर्गति चिंता का विषय है। अगर मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो गई, साथ ही बाजारवाद की मजबूरी के चलते चाटूकारिता की प्रवृत्ति इसी तरह बढ़ती गई तो तठस्थ मीडिया सिर्फ किताबों में रह जाएगी।
सोशल मीडिया के उदय ने फजऱ्ी ख़बरों या फेक न्यूज़ के प्रसार को आसान बना दिया है, जिससे प्राय: जनता में भ्रम और भ्रामक सूचना का प्रसार होता है। कहीं न कहीं ये मीडिया की विश्वसनीयता को कम कर रहा है। एक दौर था जब पत्रकारों ने एक स्वर में पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करते हुए पत्रकारिता के मूल स्वरूप को बनाये रखने पर जोर दिया। साथ ही समाज की कठिन समस्याओं पर भी अपनी लेखनी के माध्यम से सरकारों को चेताने की बात कही है, ताकि मानव जीवन के लिए कठिन होती जा रही समस्याओं का समय रहते ही निराकरण हो सके। किसी भी इमारत या ढांचे को खड़ा करने के लिए चार स्तंभों की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार लोकतंत्र रूपी इमारत में विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका को लोकतंत्र का तीन प्रमुख स्तम्भ माना जाता है, जिनमें चौथे स्तम्भ के रूप में मीडिया को शामिल किया गया है। किसी देश में स्वतंत्र व निष्पक्ष मीडिया उतनी ही आवश्यक व महत्वपूर्ण है जितना लोकतंत्र के अन्य स्तम्भ। इस प्रकार पत्रकार समाज का चौथा स्तम्भ होता है जिस पर मीडिया का पूरा का पूरा ढांचा खड़ा होता है। जो नींव का कार्य करता है यदि उसी को भ्रष्टाचार व असत्य रूपी घुन लग जाए तो मीडिया रूपी स्तम्भ व लोकतंत्र रूपी इमारत को गिरने से बचाने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। वर्तमान समय में मीडिया की उपयोगिता, महत्व एवं भूमिका निरंतर बढ़ती जा रही है, लेकिन इसकी भूमिका पर लगातार उंगली भी उठ रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आगे आने बाद मीडिया कर्मियों पर तेजी से खबरें परोसने का दबाव बढ़ गया है। इसके चलते भी गलतियों की गुंजाइश बढ़ जाती है। साथ ही खबरों की तह तक ना जाकर सतही जानकारी परोसने की मजबूरी भी।
यह सूचना समर का समय है। सूचनाओं की भरमार के बीच यह सवाल लाजमी हो गया है कि एक आदमी को कितनी सूचनाएं, कितनी जानकारी, कितना मनोरंजन चाहिए। ब्रेकिंग न्यूज, प्रायोजित न्यूज और टीआरपी के चक्कर में मीडिया खुद ही अपनी कब्र खोद रहा है। सवाल, जवाब और निर्णय सुनाने के साथ-साथ अब मीडिया अपनी प्रस्तुति को ड्रामेटाइज करने लगा है। ऐसा नहीं था कि प्रिंट मीडिया के दौर में पीत पत्रकारिता नहीं हो रही होगी या समाचार पत्र अपने हितों को नहीं साध रहे थे। निष्पक्ष पत्रकारिता करने वाले समाचार पत्रों के अपने व्यवसायिक हित भी थे, किन्तु उनकी खबरों में इतनी लम्पटता, अविश्वसनीयता या पूर्वाग्रह नहीं था, जितना की आज के टीवी चैनलों, न्यूज वेबपोर्टल पर दिखाई देता है।
मीडिया ने जहां जनता को निर्भीकतापूर्वक जागरूक करने, भ्रष्टाचार को उजागर करने, सत्ता पर तार्किक नियंत्रण एवं जनहित कार्यों की अभिवृद्धि में योगदान दिया है। वहीं लालच, भय, द्वेष, स्पर्धा, दुर्भावना एवं राजनैतिक कुचक्र के जाल में फंसकर अपनी भूमिका को कलंकित भी किया है। व्यक्तिगत या संस्थागत निहित स्वार्थों के लिये यलो जर्नलिज़्म को अपनाना, टीआरपी के लिए गंभीर खबरों की जगह पर चटपटी खबरों को तवज्जो देना और खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप आज आम है।
आज राजनैतिक खबरों को लेकर जिस तरह से मीडिया पर किस दल विशेष के साथ खड़े होने का आरोप लग रहा है उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। कहीं न कहीं मीडियाकर्मियों को इतना मजबूत बनना होगा ताकि कहीं पर भी उस पर इस तरह आरोप न लगा दें।
सामाजिक प्रतिबद्धता को तो मीडिया कब से अलविदा कह चुका है। आज का मीडिया जितना राजनीतिक आग्रहों से संचालित होता है, उससे कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा और निजी लाभ के गणित तैयार होने लगे हैं। ऐसा लगता है, जैसे यह सदी अपने साथ सूचना-युद्ध के नाद को साथ लेकर आई है। सूचना तंत्र अब विश्व इकोनॉमी को संचालित कर रहा है या इसमें बड़ी भूमिका अदा कर रहा है।
इंटरनेट के आने से प्रिंट मीडिया को परोक्ष में कोई खतरा नहीं है, लेकिन खबर से लेकर विज्ञापन तक का स्वरूप बदला है। प्रिंट मीडिया का पुराना स्वरूप, संरचना, लेआउट से लेकर भाषा तक बदल चुकी है। इंटरनेट ने सेंसर जैसे अनिवार्य दखल को खत्म कर दिया है। कुल मिलाकर नैतिकता की सबसे ज्यादा दुहाई देने वाले मीडिया को अब लोकतंत्र की चिंता नहीं है। इसीलिए भी उस पर अब निशाना साधना राजनेताओं के लिए भी आसान होते जा रहा है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

MENU