Editor-in-chief सुभाष मिश्र की कलम से- गुजारा के लिए भत्ता

Editor-in-chief सुभाष मिश्र

-सुभाष मिश्र

गुजारा भत्ता का आशय है कि किसी के पास अपने लिए आय नहीं है और उसको जीवन का गुजारा करना हो तो उसको गुजारा भत्ता मिलता है। बहुत बार सरकारें बेरोजगारी भत्ता देती है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन का भत्ता देती है, पर एक विवाहिता स्त्री को किसी कारणों से तलाक़ हो जाए या पति से संबंध विच्छेद हो जाए तो उसको गुजारा भत्ता मिलने का एक हक था पर हमने यह देखा कि हमारे देश में यह हक भी छीन लिया गया और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दे दिया। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के लिए गुजारा भत्ता दिया जाएगा। 40 साल बाद यह मामला फिर सुखिऱ्यों में है। पहली बार में यह मामला 1986 में उठा था। जब राजीव गांधी की सरकार ने 1985 में सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो के पक्ष में आए फैसले को पलटते हुए मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून बना दिया था। अब अब्दुल समद नामक शख्स ने पत्नी को गुजारा भत्ता देने के तेलंगाना हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है। महिला को मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 अधिनियम के प्रावधानों के तहत ही चलना होगा। इस मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है, फिर चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। हालांकि जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आया तो कोर्ट के सामने सवाल था कि इस केस में मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 को प्राथमिकता मिलनी चाहिए या सीआरपीसी की धारा 125 को। सीआरपीसी की धारा 125 में पत्नी, संतान और माता-पिता के भरण-पोषण को लेकर विस्तार से जानकारी दी गई है। इस धारा के अनुसार पति, पिता या बच्चों पर आश्रित पत्नी, मां-बाप या बच्चे गुजारे-भत्ते का दावा केवल तभी कर सकते हैं, जब उनके पास आजीविका का कोई और साधन उपलब्ध नहीं हो। इस मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है, फिर चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। मुस्लिम महिलाएं भी इस प्रावधान का सहारा ले सकती हैं और गुजारा भत्ता मांग सकती हैं।
अब यहां सोचने की जरूरत है कि यह पूरा मामला क्या है? हमारे देश में अधिकांश महिलाएं के ना तो श्रम की कोई कीमत होती है और ना ही अगर उनका पति ज्यादती करते हुए उसे छोड़ दें तो उसे अपने हक को पाने के लिए कोर्ट में जाना पड़ता है। आजकल तो पारिवारिक कोर्ट भी हो गए हैं जहां एक प्रकार का समझौता होता है। इस कोर्ट में चालाक पति बताते हैं कि ना तो वह सरकारी नौकरी में हैं और ना ही उसके पास इतना पैसा है कि गुजारा भत्ता दे सके। यह हर धर्म के लोग करते हैं। अगर महिला की बात करें तो वह ज्यादा प्रताडि़त होती हैं पर यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया है कि तो हमें पीछे जाना पड़ेगा। शाहबानो इंदौर की रहने वाली थी। साल 1975 में शाह बानो के पति मोहम्मद अहमद खान ने उसे तलाक देकर शाहबानो और उसके 5 बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया था। उस समय शाहबानो की उम्र 59 साल की थी। शाहबानो ने बच्चों के लिए हर महीने गुजारा भत्ता देने की मांग की लेकिन उसके पति ने किसी भी तरह की मदद करने से इनकार कर दिया। इस मामले में साल 1985 में उच्चतम न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत हर महीने मोहम्मद अहमद खान को 179.20 रुपये देने थे। इसी आदेश में संविधान पीठ ने सरकार से समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढऩे की अपील की थी। समान नागरिक संहिता वाले टिप्पणी और इस फैसले को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बॉर्ड ने नाराजगी जताई। मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेक दिए थे। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून 1986 सदन में पेशकर कानून बना दिया। सरकारें वोट बैंक के कानून में बदलाव करती रही हैं। इसी कड़ी में भाजपा ने तीन तलाक पर कानून बनाकर इसे गैरकानूनी कर दिया है। मुस्लिम पर्सनल ला और एक देश एक कानून पर भी बात हो रही है।
कानून में समानता का अधिकार होने के बावजूद महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है। शाहबानो मामले में राजीव गांधी सरकार द्वारा उठाए गए कदम को लेकर देश भर में सरकार के खिलाफ एक माहौल देखने को मिला। जब भी तुष्टिकरण, सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संविधान के सम्मान की बात होती है तो बीजेपी इस मुद्दे को उठाती है। हालांकि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में पीएमओ के संयुक्त सचिव रहे मणिशंकर अय्यर ने अपनी किताब ‘द राजीव आई न्यू’ में सवाल उठाया कि अगर शाह बानो मामले में राजीव गांधी का बनाया कानून ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ था, तो दूसरी सरकारों ने उसे बदला क्यों नहीं? हालांकि साल 2001 में राजीव गांधी की हत्या के 10 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 को बरकरार रखते हुए कहा कि मुस्लिम पति को अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने के दायित्व से मुक्त नहीं करता है। यह गुजारा भत्ता को तीन महीने की इद्दत अवधि तक भी सीमित नहीं करता है।
कई मामलों में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता नहीं मिल पाता है या मिलता है तो भी इद्दत की अवधि तक। इद्दत एक इस्लामिक परंपरा है इसके अनुसार, अगर किसी महिला को उसका पति तलाक दे देता है या उसकी मौत हो जाती है तो महिला इद्दत की अवधि तक दूसरी शादी नहीं कर सकती। इद्दत की अवधि करीब 3 महीने तक रहती है। ये अवधि पूरा होने के बाद तलाकशुदा मुस्लिम महिला दूसरी शादी कर सकती है। हालांकि, अप्रैल 2022 में एक मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला इद्दत की अवधि के बाद भी गुजारा भत्ता पाने की हकदार है और उसे ये भत्ता तब तक मिलता रहेगा, जब तक वो दूसरी शादी नहीं कर लेती। इसी तरह इसी साल जनवरी में एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला अगर दोबारा शादी भी कर लेती है तो भी वो पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।
पति-पत्नी के बीच की छोटी सी अनबन ही क्यों ना हो, यदि पति तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह देगा तो उसे इस्लाम के अनुसार तलाक माना जाता है। आजकल लोग मोबाइल पर एसएमएस और ईमेल के जरिए भी तलाक लेने लगे। इसके कारण महिलाओं को मानसिक पीड़ा होती थी। उसके कारण इस व्यवस्था को 2017 में उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इस्लाम में विवाह के समय उसकी सुरक्षा के लिए सभी प्रावधानों के अलावा यह विशेष रूप से तय किया गया था कि महिला को अपने मेहर पर पूरा अधिकार है। मेहर एक विवाह उपहार है जो उसके पति द्वारा उसे दिया जाता है और विवाह अनुबंध में शामिल होता है। यह स्वामित्व उसके पिता या पति को हस्तांतरित नहीं होता है। इस्लाम में मेहर की अवधारणा महिला के लिए एक वास्तविक या प्रतीकात्मक मूल्य है, जैसा कि कुछ संस्कृतियों में था, बल्कि यह प्यार और स्नेह का प्रतीक एक उपहार है।
गुजारा भत्ता पूर्व पत्नी को इसलिए दिया जाता है कि वह एक सम्मानजनक जीवन निर्वाह कर सके। पति के साथ रहने के समय से उसका जो जीवनयापन स्तर रहा था, वही खर्च स्तर पर चलता रहे। एक औसत भारतीय स्त्री विवाह के बाद अपना तन-मन, करियर आदि के साथ बहुत कुछ बदलाव करती है ताकि वह अपने पति के साथ घर बसाएं। गर्भधारण, बच्चे, घर की साफ-सफाई, सास-ससुर की सेवा, पति का पसंद-नापसंद, पति का कार्यस्थल आदि विभिन्न बातें हैं जो एक पत्नी देखती है। इन कारणों से वह कई बार नौकरी नहीं कर पाती। उम्र बीतने के बाद बहुत सारे अवसर समाप्त हो जाते हैं, नौकरी के लिए भी और पुनर्विवाह के लिए भी। बच्चा पैदा करने की उम्र भी पुरुषों की तुलना में कम है महिलाओं की। गर्भधारण, गर्भनिरोधक सर्जरी और गर्भनिरोधक गोलियों का लंबे समय तक का उपयोग शरीर पर स्थायी प्रभाव डाले होते हैं। यदि उस पूर्व पति के बच्चे की जिम्मेदारी भी है पूर्व पत्नी के पास, तो उसका भी खर्च देना होगा। स्त्री कहीं की भी उसे गुजारा के लिए भत्ता पाने का अधिकार है। सरकार को तुष्टिकरण के कानून नहीं बदलना चाहिए। यह अच्छी बात है कि हमारी कोर्ट महिलाओं की पीड़ा समझ रही है और शाह बानो मामले में जो गलती हुई थी, उसको सुधारने की बात हुई। आर्थिक रूप से स्वावलंबी स्त्री का शोषण नहीं हो सकता है। कोर्ट भी यह बात समझ रहा है कि अगर पूर्व पति को गुजारा भत्ता देना होगा। ताजा फैसला निश्चित रूप महिलाओं खासकर मुस्लिम महिलाओं के हक में माना जाएगा। स्त्री अभी भी हमारे देश में पुरुष पर आश्रित हैं। हालांकि अब स्त्रियां घर से बाहर निकल रही है और आर्थिक रूप से संपन्न हो रही है। सरकार की तमाम तरह की योजनाएं भी उनको स्वावलंबी बना रही है, यही वजह है कि स्त्री अब जागरूक हो रही हैं।

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