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II छत्तीस घाट : राजनीतिक शौचालय' की पहली ईंट किसने रखी थी भला..!

II छत्तीस घाट :  राजनीतिक शौचालय' की पहली ईंट किसने रखी थी भला..!

संदर्भ : जोगी परिवार पर कसता न्याय का शिकंजा


अनिल द्विवेदी

लाखों इच्छाओं के अनुकूल और सैकड़ों अनिच्छाओं के प्रतिकूल जाते हुए पूर्व विधायक और जोगी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी फर्जी नागरिकता के मामले में जब 14 दिन के लिए जेल भेजे गए तो वे किंचित भी भयभीत नही थे! जेल के दरवाजे पर खड़े होकर उन्होंने सरकार को निर्भिकता के साथ ललकारते हुए कहा, 'न्यायालय मेरे साथ है..हम उपरी अदालत तक लड़ेंगे..भूपेश बघेल अपने राजनीतिक शौचालय से गँध फैलाते रहें.' साफ है कि जोगीद्वय की लड़ाई मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से है. पर क्या यह अपराध और दंड का काव्यात्मक विधान भर है?

राजनीति के विशारद कहते हैं कि मामला सियासतदां का हो तो आप उसे सरल और सहज समझने की भूल न करें. यह ऋजु रेखाओं का ऐसा जटिल जाल होता है, जिसे सुलझाने में ज्यामिती-शास्त्र के विद्वान तक असफल हो जाएं. जोगी परिवार भी इन्हीं में उलझकर रह गया है. बड़े जोगी जाति के मामले में और छोटे जोगी नागरिकता के फेर में. मरवाही में अमित जोगी की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा नेत्री समीरा पैकरा ने रिपोर्ट लिखाते हुए आरोप लगाया था कि अमित ने 2013 विधानसभा चुनाव में अपने जन्म स्थान के बारे में चुनाव आयोग को गलत जानकारी दी थी. इसकी छह महीने तक चली जांच के बाद जोगी को गिरफतार किया गया.

समय की मार से तो देवता भी नही बच सके, फिर हम तो इंसान हैं इसलिए जोगी परिवार अपने अब तक के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है. फिल्म का गाना है ना : तेरा टाइम आएगा, तो आ गया. जगगी परिवार तो ना जाने कब से इस अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था! पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने इजारेदाराना प्रहार करते हुए बेटे की गिरफतारी को 'राजनीतिक प्रतिशोध' बताया है जो आम आदमी के गले नही उतर रहा. मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपेश बघेल ने जिस तरह कड़ुवाहट को भुलाते हुए बिलासपुर के रेस्ट हाउस में जोगी परिवार से मुलाकात की, वह प्रशंसनीय और प्रेरक थी. कांग्रेस के बड़े नेता भी बताते हैं कि भूपेश बघेल ने लेफट के बजाय राइट का रास्ता पकड़ लिया था. छुट—पुट बयानों को छोड़ दें तो अजीत जोगी ने कड़वे बयानों से किनारा ही किए रखा लेकिन छोटे जोगी जहर उगलते रहे. मुख्यमंत्री की माता के निधन पर जिस तरह निर्मम बयानबाजी की, उस पर उनके पिता अजीत जोगी सहित मुख्यमंत्री और आम आदमी ने भी अफसोस ही जताया था.

इतिहासबयां है कि जोगी परिवार और भूपेश बघेल के बीच रार सालों से ठनी है. याद करें कि अजीत जोगी ने विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जिन पांच नामों को खुलेआम हराने की बात कही थी, उनमें से एक भूपेश बघेल भी थे. पर जनता-जनार्दन की इच्छा के आगे किसकी चली है भला! बघेल जी मुख्यमंत्री बने, यह तो उनके 'दुश्मन' भी चाहते थे इसलिए अजीत जोगी का यह दूसरी राजनैतिक हार थी. इसके पहले भूपेश बघेल ने ही अजीत जोगी को कांग्रेस से बाहर खदेड़कर एक बड़ा दर्द दिया था.

समय से बहस करते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के नेतृत्व वाले उन तीन सालों को याद कीजिए जिसमें छत्तीसगढ़ की राजनीति विधायक खरीदी काण्ड, जग्गी हत्याकाण्ड, फोन टेपिंग काण्ड और दलबदल जैसे काण्डों से कांव—कांव कर रही थी. लोग त्राहिमाम् की गुहार लगाते फिर रहे थे. इस डर को बीजेपी ने 15 साल तक भुनाया और कांग्रेस कीमत चुकाती रही. गोयाकि अमित जोगी सुप्रीम कोर्ट के वकील रहे हैं. कानूनी दांव-पेंच बखूबी जानते हैं. अगर आप भुलुंठित नही हुए होंगे तो जगगी हत्याकाण्ड से छोटे जोगी बाइज्जत बरी हो चुके हैं. जूदेव-जोगी सीडी काण्ड में भी वे पाक साफ निकले. और यदि झीरम घाटी काण्ड की बात करें तो इस मामले में भी शक की उंगलियां नक्सली या सरकार से ज्यादा जोगीद्वय पर उठाई गई, लेकिन 10 साल के कांग्रेसी शासन यूपीए सरकार में उनसे पूछताछ तक नही हुई. एनआईए ने भी जोगीद्वय की तरफ आंख तक नही फेरी.

फिलवक्त कांग्रेस से लेकर जोगी कांग्रेस तक और आम आदमी के बीच यह खुसरपुसर है कि ऐसे फैसलों से हमारा विश्वास न्याय व्यवस्था पर और पुख्ता होता है वरना 2007 में छत्तीसगढ़ के एक न्यायालय के उस फैसले पर कितनी थू-थू हुई थी, जब जग्गी हत्याकाण्ड के आरोपी बरी हो गए थे. इसे बिके हुए न्याय की संज्ञा दी गई थी. अमित जोगी का जेल जाना कानूनी प्रक्रियायाभर है या वह इस अवसर का इस्तेमाल अपना और अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए करना चाहते हैं, इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में है.

रही अपराध और दंड-विधान की बात. तो यह जान लीजिए कि 'सिट' या सीआईडी जैसी संस्थाओं का गठन ही ‘हाई प्रोफाइल’ मामलों की जांच के लिए किया गया था. उन्हें अपने कर्तव्य के पालन हेतु रसूखदार लोगों पर ही हाथ डालना होता है. वे अपने कर्तव्य का पालन कर सकें, इसके लिए उन्हें ‘दबाव मुक्त’ बनाना होगा. ये हो कैसे? इस सवाल का एकमात्र जवाब यह है कि हमारे सियासतदां कम से कम इस मुद्दे पर एकराय हों कि पद के दुरुपयोग के मामले में हम ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाएंगे। जब सभी दल और उनके नेता विपक्ष में रहते हुए इन संस्थाओं पर आरोपों की बौछारें कर चुके हों, तो इसके अलावा चारा भी क्या है? फर्जी जाति प्रमाण—पत्र बनाने वाले अफसर या लालच में आकर न्याय को बेचने वालों पर नकेल कसने की जरूरत है.

ढंका—छुपा नही रहा कि अजीत जोगी अपनी बढ़ती उम्र और घटती सेहत के आगे विवश हैं. निराश भी हैं क्योंकि पार्टी के अधिकांश नेता उन्हें अलविदा कर चुके है. पार्टी की कमान पूरी तरह अमित ने अपने हाथों में ले ली है. वे यह बखूबी जानते हैं कि राजनीति में जो दिखता है, वह बिकता है इसलिए मोर्चा संभाले हुए हैं. हालिया जेल-यात्रा उन्हें कुछ लाभ दे सकती है! खासतौर पर बस्तर में हो रहे उपचुनाव और स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी को आक्सीजन मिल सकता है. अमित को छत्तीसगढ़ की वैकल्पिक राजनीति का उभरता हुआ सितारा माना जाता है. भविष्य की संभावनाएं जो भी हों, राजनीतिक शौचालय से उन्हें बाहर निकलना ही होगा.